मंदिर प्रबंधन ने भूमि हस्तांतरण और राजस्व रिकॉर्ड में अनियमितताओं के लगाए आरोप, ऐतिहासिक धार्मिक संपत्ति के संरक्षण की उठाई मांग
नीतीश कुमार सिंह, चंडीगढ़
चंडीगढ़, 27 अक्टूबर : हिमाचल प्रदेश के औद्योगिक क्षेत्र बद्दी-बरोटीवाला-नालागढ़ में स्थित करीब 600 वर्ष पुराने ठाकुरद्वारा श्री नरसिंह जी मंदिर की 41 बीघा 10 बिस्वा भूमि को लेकर विवाद गहरा गया है। मंदिर प्रबंधन ने भूमि हस्तांतरण, राजस्व रिकॉर्ड में कथित अनियमितताओं और प्रस्तावित आवासीय टाउनशिप के निर्माण पर सवाल उठाए हैं। प्रबंधन के अनुसार, इस मामले में हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट में जनहित याचिका संख्या 115/2026 दायर की गई है, जिस पर अदालत ने संबंधित विकास गतिविधियों पर स्थगन आदेश जारी किया है।
चंडीगढ़ प्रेस क्लब में आयोजित प्रेस वार्ता में मंदिर के मुख्य सेवादार रमेश चंद्र, समाजसेवी राजेश कुमार और हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट की वरिष्ठ अधिवक्ता अंबिका कोटवाल ने मामले से जुड़े विभिन्न पहलुओं की जानकारी दी। मंदिर प्रबंधन ने आरोप लगाया कि धार्मिक धरोहर से जुड़ी भूमि के हस्तांतरण के बाद वहां पेड़ों की कटाई, खनन और आवासीय प्लॉट विकसित करने की प्रक्रिया शुरू की गई। प्रबंधन के मुताबिक, प्रस्तावित टाउनशिप परियोजना का मूल्य करीब 125 करोड़ रुपये से अधिक बताया जा रहा है।
राजा विक्रम चंद्र के भूमि दान से जुड़ा है इतिहास
मंदिर प्रबंधन के अनुसार, वर्ष 1421 में राजा विक्रम चंद्र ने मंदिर के निर्माण और धार्मिक गतिविधियों के लिए 1730 बीघा 12 बिस्वा भूमि दान की थी। प्रबंधन का दावा है कि वर्ष 1972 में हिमाचल प्रदेश सरकार ने भूमि के रखरखाव के नाम पर इसमें से 1564 बीघा 13 बिस्वा जमीन अपने अधीन ले ली थी। इसके बाद मंदिर की शेष संपत्ति, धार्मिक गतिविधियों और ऐतिहासिक विरासत के संरक्षण को लेकर लगातार सवाल उठते रहे।
प्रबंधन का आरोप है कि वर्ष 2017 में मंदिर की भूमि वापस दिलाने और उसके जीर्णोद्धार का आश्वासन देकर 41 बीघा 10 बिस्वा जमीन का हस्तांतरण कराया गया। इस प्रकरण में स्थानीय विधायक राम कुमार चौधरी और कुछ अन्य व्यक्तियों की भूमिका पर भी सवाल उठाए गए हैं। हालांकि, इन आरोपों पर संबंधित पक्षों का जवाब तथा अदालत का अंतिम निर्णय सामने आना बाकी है।
इंतकाल और न्यायिक रिकॉर्ड पर उठाए सवाल
प्रेस वार्ता में मंदिर प्रबंधन ने भूमि हस्तांतरण से जुड़े दस्तावेजों और राजस्व रिकॉर्ड में कथित विसंगतियों का मुद्दा उठाया। प्रबंधन के अनुसार, 24 जुलाई 2017 को नालागढ़ में पंजीकृत समझौते से संबंधित दस्तावेजों की जांच के दौरान तबादला रजिस्ट्री संख्या 1240 का उल्लेख सामने आया। इस आधार पर दर्ज इंतकाल संख्या 1413 को 16 अप्रैल 2018 को रद्द किए जाने की बात भी कही गई।
प्रबंधन का कहना है कि स्वामित्व की घोषणा से संबंधित मुकदमा संख्या 60/2018 की कार्यवाही के दौरान संपत्ति की प्रकृति और इंतकाल से जुड़े तथ्यों में कई विसंगतियां सामने आईं। इसके अतिरिक्त, 26 अक्टूबर 2024 के निचली अदालत के फैसले और 28 अप्रैल 2025 के इंतकाल को भी चुनौती दिए जाने की जानकारी दी गई।
हाईकोर्ट के आदेश से मामले ने पकड़ा जोर
वरिष्ठ अधिवक्ता अंबिका कोटवाल के अनुसार, हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने मामले में संबंधित विकास गतिविधियों पर रोक लगाते हुए राजस्व एवं न्यायिक रिकॉर्ड तलब किए हैं। मंदिर प्रबंधन ने इसे ऐतिहासिक धार्मिक संपत्ति के संरक्षण की दिशा में महत्वपूर्ण कदम बताया है। हालांकि, भूमि के स्वामित्व, हस्तांतरण की वैधता और संबंधित व्यक्तियों की भूमिका पर अंतिम निष्कर्ष न्यायिक प्रक्रिया के बाद ही स्पष्ट होगा।
मंदिर प्रबंधन ने बद्दी-बरोटीवाला-नालागढ़ के उद्योग जगत, व्यापारियों और आम नागरिकों से मंदिर की ऐतिहासिक एवं धार्मिक विरासत के संरक्षण में सहयोग की अपील की है। प्रबंधन का कहना है कि मामला केवल भूमि विवाद तक सीमित नहीं है, बल्कि इससे धार्मिक संपत्तियों की सुरक्षा, राजस्व रिकॉर्ड की पारदर्शिता और औद्योगिक क्षेत्रों में भूमि के उपयोग से जुड़े महत्वपूर्ण प्रश्न भी जुड़े हैं।

















