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चंडीगढ़/ पीयू के विधि विद्यार्थियों ने ब्रिटिश शासन के दौरान भारत में मतदान अधिकारों के इतिहास पर की चर्चा

नेशनल आवाज सत्र में 150 से अधिक विद्यार्थी और शिक्षक शामिल, ब्रिटिश उपनिवेशवाद के पीड़ितों की याद में राष्ट्रीय स्मृति दिवस बनाने की उठी मांग

चंडीगढ़, 30 अक्टूबर 2026: पंजाब विश्वविद्यालय के विधि विभाग की प्रो. अनिल कुमार ठाकुर डिबेटिंग सोसायटी की ओर से म्यूजियम ऑफ ब्रिटिश कोलोनियलिज्म (एमबीसी) के सहयोग से नेशनल आवाज सत्र का आयोजन किया गया। विभाग के मूट कोर्ट हॉल में आयोजित इस कार्यक्रम में 150 से अधिक विद्यार्थियों और शिक्षकों ने भाग लिया। सत्र में ब्रिटिश शासन के दौरान भारत में मतदान के अधिकारों के इतिहास और आजादी के बाद लोकतांत्रिक व्यवस्था में आए बदलावों पर चर्चा की गई।

कार्यक्रम का मुख्य विषय ‘मतदान अधिकारों का औपनिवेशिक इतिहास’ था। चर्चा के दौरान बताया गया कि ब्रिटिश शासन के समय मतदान का अधिकार सभी लोगों को नहीं था। संपत्ति, आमदनी और शिक्षा जैसी शर्तों के आधार पर केवल कुछ चुनिंदा लोगों को ही वोट देने का अधिकार मिलता था। इसके अलावा अलग-अलग समुदायों के लिए अलग निर्वाचन व्यवस्था भी लागू की गई थी, जिसका देश की राजनीतिक व्यवस्था पर प्रभाव पड़ा।

वक्ताओं ने कहा कि आजादी के बाद भारतीय संविधान ने इस व्यवस्था को बदलते हुए सभी वयस्क नागरिकों को समान मतदान का अधिकार दिया। अब किसी व्यक्ति के वोट देने का अधिकार उसकी संपत्ति, आमदनी, शिक्षा या सामाजिक स्थिति पर निर्भर नहीं करता। यह भारत के लोकतांत्रिक इतिहास का एक महत्वपूर्ण बदलाव था।

विधि विभाग की प्रो. (डॉ.) सुपिंदर कौर ने कहा कि पंजाब विश्वविद्यालय का अपना ऐतिहासिक महत्व है और इस तरह के कार्यक्रम विद्यार्थियों को इतिहास, कानून और वर्तमान सामाजिक परिस्थितियों को समझने का अवसर देते हैं। उन्होंने कहा कि डिबेटिंग सोसायटी राष्ट्रीय महत्व के विषयों पर लगातार कार्यक्रम आयोजित कर रही है। उन्होंने कार्यक्रम के सफल आयोजन के लिए विश्वविद्यालय के कुलपति, विशेष अतिथि लल्लन बघेल, शिक्षकों, कर्मचारियों, विद्यार्थियों और म्यूजियम ऑफ ब्रिटिश कोलोनियलिज्म का आभार जताया।

म्यूजियम ऑफ ब्रिटिश कोलोनियलिज्म की भारत प्रतिनिधि और विधि विभाग की छात्रा चांदनी जसवाल ने कहा कि ब्रिटिश शासन का प्रभाव आज भी भारतीय समाज के कई क्षेत्रों में दिखाई देता है। उन्होंने कहा कि देश में स्वतंत्रता सेनानियों और आजादी की लड़ाई के इतिहास को याद किया जाता है, लेकिन ब्रिटिश शासन के दौरान भुखमरी, आर्थिक शोषण और दमन के कारण जान गंवाने वाले लाखों लोगों को वह स्थान नहीं मिला, जिसके वे हकदार हैं।

उन्होंने अंग्रेजी भाषा को भारतीय भाषाओं से अधिक महत्व दिए जाने की प्रवृत्ति पर भी सवाल उठाए और कहा कि यह औपनिवेशिक सोच का ही एक प्रभाव है। उन्होंने ब्रिटिश शासन के पीड़ितों की याद में राष्ट्रीय स्मृति दिवस घोषित करने की मांग करते हुए लोगों से एमबीसी की वेबसाइट indiascolonialstory.org पर उपलब्ध याचिका का समर्थन करने की अपील की।

सत्र के दौरान विद्यार्थियों ने भी खुलकर अपने विचार रखे। चर्चा में अंग्रेजी भाषा के बढ़ते प्रभाव, हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं की स्थिति तथा भारतीय न्याय व्यवस्था पर ब्रिटिश शासन की छाप जैसे मुद्दे उठाए गए। विद्यार्थियों का कहना था कि भारत की कई कानूनी प्रक्रियाएं और अदालतों की परंपराएं आज भी ब्रिटिश शासन के समय की व्यवस्था पर आधारित हैं। ऐसे में कानून और न्याय व्यवस्था को भारतीय समाज की जरूरतों के अनुसार बेहतर बनाने पर विचार किया जाना चाहिए।

कार्यक्रम में इस बात पर जोर दिया गया कि औपनिवेशिक इतिहास को केवल किताबों तक सीमित रखने के बजाय उसके प्रभावों को वर्तमान सामाजिक, राजनीतिक और कानूनी व्यवस्था के संदर्भ में भी समझना जरूरी है।

कार्यक्रम के अंत में म्यूजियम ऑफ ब्रिटिश कोलोनियलिज्म की ओर से विद्यार्थियों और शिक्षकों से ब्रिटिश शासन के दौरान जान गंवाने वाले भारतीयों की याद में राष्ट्रीय स्मृति दिवस घोषित करने की मांग से जुड़ी याचिका का समर्थन करने की अपील की गई।

कार्यक्रम का संचालन विधि विभाग की फैकल्टी कोऑर्डिनेटर प्रो. (डॉ.) सुपिंदर कौर और डॉ. मनीषा गर्ग के मार्गदर्शन में हुआ। इसमें छात्र समन्वयक चांदनी जसवाल और दुर्गेश दामिनी ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

ज्ञात हो कि म्यूजियम ऑफ ब्रिटिश कोलोनियलिज्म एक ऐसा मंच है, जो ब्रिटिश शासन के इतिहास और उसके प्रभावों को सामने लाने का काम करता है। संस्था शोध, शैक्षणिक कार्यक्रमों और जनभागीदारी के माध्यम से औपनिवेशिक इतिहास के उन पहलुओं को भी सामने लाने का प्रयास करती है, जिन्हें अब तक कम महत्व मिला है।

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