चंडीगढ़, 21 सितंबर, 2026 : विश्व अल्जाइमर दिवस के अवसर पर पीजीआईएमईआर, चंडीगढ़ के न्यूरोलॉजी विभाग ने अल्जाइमर रोग और डिमेंशिया को लेकर लोगों में जागरूकता बढ़ाने की जरूरत बताई। विभाग के विशेषज्ञों ने कहा कि लगातार भूलने की समस्या या रोजमर्रा के काम करने की क्षमता में बदलाव को केवल बढ़ती उम्र का सामान्य हिस्सा मानकर नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। समय पर जांच से बीमारी की सही पहचान और उचित इलाज में मदद मिल सकती है।
इस अवसर पर आयोजित प्रेस कॉन्फ्रेंस में न्यूरोलॉजी विभाग के प्रो. धीरज खुराना, एडिशनल प्रोफेसर डॉ. सुचरिता रे, एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. कार्तिक वी.एम. तथा बायोकेमिस्ट्री विभाग की प्रो. इंदु वर्मा ने डिमेंशिया से जुड़े विभिन्न पहलुओं की जानकारी दी।
नए इलाज के कारण शुरुआती जांच जरूरी
प्रो. धीरज खुराना ने बताया कि अल्जाइमर के इलाज के क्षेत्र में पिछले कुछ समय में महत्वपूर्ण बदलाव हुए हैं। भारत में अल्जाइमर के लिए बीमारी की प्रगति को धीमा करने वाली नई दवाएं उपलब्ध हैं। इनका लाभ बीमारी के शुरुआती और हल्के चरणों में अधिक हो सकता है। इसलिए समय पर बीमारी की पहचान करना जरूरी हो गया है।
उन्होंने कहा कि शुरुआती जांच से यह पता लगाने में मदद मिलती है कि मरीज के लिए उपलब्ध उपचार में से कौन-सा विकल्प उपयुक्त हो सकता है। साथ ही परिवार को मरीज की देखभाल और भविष्य की जरूरतों की बेहतर योजना बनाने में भी मदद मिलती है।
डिमेंशिया सिर्फ एक बीमारी नहीं
डॉ. सुचरिता रे ने कहा कि डिमेंशिया कोई एक बीमारी नहीं बल्कि कई अलग-अलग बीमारियों के कारण होने वाली स्थिति है। इसलिए प्रत्येक मरीज की सही जांच कर यह पता लगाना जरूरी है कि डिमेंशिया का कारण क्या है। इसके आधार पर ही उचित इलाज और देखभाल की योजना बनाई जा सकती है।
उन्होंने कहा कि डिमेंशिया का असर केवल मरीज पर नहीं बल्कि पूरे परिवार पर पड़ता है। मरीज की देखभाल करने वाले पर शारीरिक, मानसिक और आर्थिक दबाव भी बढ़ सकता है। इसलिए मरीज के साथ-साथ परिवार और देखभाल करने वालों को भी आवश्यक सहयोग और मार्गदर्शन मिलना चाहिए।
PGIMER में जल्द शुरू होंगे विशेष बॉडी-फ्लूड टेस्ट
प्रेस कॉन्फ्रेंस में PGIMER की ओर से अल्जाइमर की जांच के लिए विशेष बॉडी-फ्लूड टेस्ट की सुविधा शुरू करने की जानकारी भी दी गई। बायोकेमिस्ट्री विभाग की प्रो. इंदु वर्मा ने बताया कि विभाग जल्द ही अल्जाइमर रोग से संबंधित बॉडी-फ्लूड टेस्ट का एक पैनल शुरू करेगा।
उन्होंने बताया कि इन आधुनिक जांचों से अल्जाइमर की अधिक सटीक और शुरुआती पहचान में मदद मिल सकती है। इसके अलावा इलाज के प्रभाव और संभावित उपचारों के मूल्यांकन में भी इन जांचों की भूमिका हो सकती है।
डिप्रेशन सहित दूसरी बीमारियों की भी जांच जरूरी
डॉ. कार्तिक वी.एम. ने कहा कि डिमेंशिया से पीड़ित मरीजों में अन्य स्वास्थ्य समस्याएं भी हो सकती हैं। इनमें डिप्रेशन जैसी समस्याएं शामिल हैं। इसलिए मरीज का इलाज करते समय उसकी पूरी स्वास्थ्य स्थिति को ध्यान में रखना जरूरी है।
उन्होंने कहा कि डिमेंशिया का असर परिवार के अन्य सदस्यों पर भी पड़ता है और देखभाल करने वालों पर काफी जिम्मेदारी होती है। ऐसे में मरीज और उसके परिवार दोनों को सहयोग देना जरूरी है।
मरीजों और परिवारों के लिए सपोर्ट प्रोग्राम की तैयारी
न्यूरोलॉजी विभाग ने बताया कि PGIMER में डिमेंशिया के मरीजों के इलाज और फॉलोअप की प्रक्रिया को और व्यवस्थित बनाने के लिए काम किया जा रहा है। इसके साथ ही मरीजों और उनके परिवारों को आवश्यक जानकारी, मार्गदर्शन और सहयोग देने के लिए एक पेशेंट सपोर्ट प्रोग्राम शुरू करने की भी योजना है।
विभाग के विशेषज्ञों ने कहा कि उनका उद्देश्य डिमेंशिया के मरीजों को समय पर जांच, उचित उपचार, आधुनिक जांच सुविधाएं, नियमित फॉलोअप और परिवार को आवश्यक सहयोग उपलब्ध कराना है।
विश्व अल्जाइमर दिवस पर विभाग ने लोगों से अपील की कि यदि किसी व्यक्ति में लगातार भूलने, याददाश्त कमजोर होने या रोजमर्रा के कामकाज में बदलाव जैसे लक्षण दिखाई दें तो इसे केवल उम्र बढ़ने का असर मानकर नजरअंदाज न करें और समय पर चिकित्सकीय सलाह लें।

















