
काठमांडू/जनकपुर/बिराटनगर/इटहरी/बीरगंज : भारत-नेपाल की साझा सांस्कृतिक परंपराओं का प्रतीक वटसावित्री पर्व शनिवार को नेपाल के विभिन्न शहरों में श्रद्धा और उल्लास के साथ मनाया गया। राजधानी काठमांडू सहित जनकपुर, बिराटनगर, इटहरी, धरान, बीरगंज और तराई-मधेश के कई इलाकों में सुहागिन महिलाओं ने बरगद (वट) वृक्ष की पूजा-अर्चना कर अपने पति की लंबी उम्र, सुख-समृद्धि और पारिवारिक खुशहाली की कामना की।

सुबह से ही मंदिरों एवं वट वृक्षों के आसपास महिलाओं की भीड़ देखी गई। महिलाओं ने पारंपरिक वेशभूषा एवं सोलह श्रृंगार कर पूजा की तथा वट वृक्ष के चारों ओर धागा बांधकर व्रत कथा का श्रवण किया। कई स्थानों पर सामूहिक पूजा एवं धार्मिक आयोजन भी हुए।

जनकपुरधाम के जानकी मंदिर परिसर, बिराटनगर के विभिन्न मंदिरों तथा काठमांडू के पशुपतिनाथ क्षेत्र में महिलाओं ने पूरे विधि-विधान के साथ पूजा-अर्चना की। नेपाल के मधेश और तराई क्षेत्रों में इस पर्व को विशेष उत्साह के साथ मनाया जाता है, क्योंकि यहां भारतीय संस्कृति और मिथिला परंपरा का गहरा प्रभाव देखने को मिलता है।

पूजा में शामिल अनिता कर्ण ने कहा कि वटसावित्री व्रत भारतीय और नेपाली संस्कृति की साझा विरासत है। यह पर्व महिलाओं के विश्वास, समर्पण और परिवार के प्रति उनके प्रेम को दर्शाता है।

पूनम मल्लिक ने कहा कि इस प्रकार के धार्मिक पर्व समाज में पारिवारिक एकता और सांस्कृतिक मूल्यों को मजबूत करने का कार्य करते हैं। उन्होंने कहा कि महिलाएं पूरे वर्ष इस पर्व का इंतजार करती हैं और बड़ी श्रद्धा से व्रत रखती हैं।
भाग्यश्री झा व सोनी झा ने बताया कि वटसावित्री केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि पति-पत्नी के अटूट विश्वास और प्रेम का प्रतीक है। उन्होंने कहा कि नेपाल के तराई क्षेत्रों में यह पर्व हर वर्ष अत्यंत उत्साह के साथ मनाया जाता है।

नूतन कर्ण व सोनिका कर्ण ने कहा कि आधुनिक जीवनशैली के बावजूद पारंपरिक पर्वों के प्रति महिलाओं की आस्था आज भी मजबूत बनी हुई है। उन्होंने युवा पीढ़ी से भी अपनी संस्कृति और परंपराओं से जुड़े रहने की अपील की।
हेमा मंडल ने कहा कि वटसावित्री व्रत महिलाओं को आध्यात्मिक शक्ति और सकारात्मक ऊर्जा प्रदान करता है। इस तरह के धार्मिक आयोजनों से समाज में आपसी भाईचारा और सामाजिक समरसता भी बढ़ती है।

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार वटसावित्री व्रत नारी शक्ति, समर्पण और अटूट वैवाहिक संबंध का प्रतीक माना जाता है। इस व्रत में महिलाएं दिनभर निर्जला या फलाहार व्रत रखकर बरगद के वृक्ष की पूजा करती हैं। मान्यता है कि इस व्रत के प्रभाव से पति की आयु लंबी होती है तथा परिवार में सुख-शांति बनी रहती है।

इस व्रत कथा का क्या है महत्व ?
वटसावित्री व्रत की कथा का संबंध देवी सावित्री और उनके पति सत्यवान से जुड़ा हुआ है। पौराणिक कथा के अनुसार राजकुमारी सावित्री ने सत्यवान को अपना पति चुना था, जबकि उन्हें यह ज्ञात था कि सत्यवान अल्पायु हैं। विवाह के कुछ समय बाद जब सत्यवान वन में लकड़ी काटते समय अचेत होकर गिर पड़े, तब यमराज उनके प्राण हरने पहुंचे।

सावित्री ने दृढ़ संकल्प, तप और अपने पतिव्रता धर्म के बल पर यमराज का पीछा किया। उनकी भक्ति और बुद्धिमत्ता से प्रसन्न होकर यमराज ने सत्यवान को पुनर्जीवन प्रदान कर दिया। तभी से यह व्रत पति की दीर्घायु और अखंड सौभाग्य के प्रतीक के रूप में मनाया जाता है।
धर्माचार्यों के अनुसार बरगद का वृक्ष दीर्घायु, स्थिरता और जीवन शक्ति का प्रतीक माना जाता है। इसी कारण महिलाएं वट वृक्ष की पूजा कर अपने दांपत्य जीवन की सुख-समृद्धि की कामना करती हैं। नेपाल में भी यह पर्व सामाजिक एवं सांस्कृतिक एकता का प्रतीक बनता जा रहा है।

















