मैथिली नाट्य साहित्य की विकास यात्रा पर हुआ गंभीर विमर्श
नई दिल्ली, 27 सितंबर : मैथिली भाषा और साहित्य की समृद्ध परंपरा को नई पीढ़ी से जोड़ने की दिशा में मैथिली साहित्य महासभा (मैसाम), दिल्ली की ओर से 12वां विद्यापति स्मृति एकल व्याख्यान एवं मैसाम युवा सम्मान समारोह-2026 आयोजित किया गया। कॉन्स्टिट्यूशन क्लब ऑफ इंडिया, रफी मार्ग में आयोजित कार्यक्रम में मैथिली साहित्य के विभिन्न पक्षों पर साहित्यकारों और विद्वानों ने विचार साझा किए।
कार्यक्रम में सुप्रसिद्ध साहित्यकार एवं आलोचक डॉ. रामानन्द झा ‘रमण’ ने ‘मैथिली नाट्य साहित्य का विकास’ विषय पर एकल व्याख्यान दिया। उन्होंने मैथिली नाट्य साहित्य के विकासक्रम, प्रमुख रचनाकारों और साहित्यिक प्रवृत्तियों के साथ इसके सामाजिक एवं सांस्कृतिक सरोकारों को रेखांकित किया। उन्होंने मैथिली नाट्य परंपरा के विभिन्न पड़ावों और बदलते समय के साथ इसके स्वरूप में आए बदलाव पर भी विस्तार से चर्चा की।
समारोह में युवा साहित्यकार डॉ. भास्कर ज्योति को उनके यात्रा-वृत्तांत ‘अथक अविराम’ के लिए मैसाम युवा सम्मान-2026 प्रदान किया गया। निर्णायक मंडल की सदस्य श्रीमती कल्पना झा ने सम्मानित कृति की साहित्यिक विशेषताओं पर प्रकाश डाला।
इस दौरान मैथिली की छह पुस्तकों का लोकार्पण किया गया। साथ ही मैसाम की अर्द्धवार्षिक साहित्यिक पत्रिका ‘अपूर्वा’ का विमोचन भी हुआ। पत्रिका का संपादन संजीव सिन्हा एवं उज्ज्वल कुमार झा ने किया है।
कार्यक्रम की अध्यक्षता साहित्य अकादेमी के मैथिली भाषा विभाग के संयोजक प्रो. उदय नारायण सिंह ‘नचिकेता’ ने की। मैसाम के अध्यक्ष हेमन्त झा ने अतिथियों एवं उपस्थित साहित्यप्रेमियों का स्वागत किया। राज किशोर मिश्र ने भी अपने विचार रखे। कार्यक्रम का संचालन संजीव सिन्हा ने किया, जबकि मंजूषा झा ने धन्यवाद ज्ञापन किया।
समारोह में दिल्ली समेत विभिन्न क्षेत्रों से आए साहित्यकारों, लेखकों, विद्वानों, पाठकों और मैथिलीप्रेमियों की सहभागिता रही। इस अवसर पर मैथिली साहित्य महासभा की कार्यकारिणी 2026-28 के पदाधिकारियों एवं सदस्यों का परिचय भी कराया गया।
आयोजकों के अनुसार, कार्यक्रम का उद्देश्य विद्यापति की साहित्यिक परंपरा को स्मरण करते हुए मैथिली भाषा-साहित्य के समकालीन सृजन और युवा प्रतिभाओं को प्रोत्साहित करना है। व्याख्यान, पुस्तक लोकार्पण और युवा सम्मान के माध्यम से समारोह में मैथिली साहित्य की परंपरा तथा वर्तमान रचनात्मक गतिविधियों के बीच संवाद का अवसर बना।

















