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पुण्य तिथि विशेष आलेख/ वैश्विक आध्यात्मिक गुरु – स्वामी विवेकानन्द

✍️ डॉ. विनय कुमार श्रीवास्तव
     वरिष्ठ प्रवक्ता – पी बी कालेज, प्रतापगढ़ सिटी, उ.प्र.

वेद वेदांतों के प्रकाण्ड विद्वान और प्रभावशाली आध्यात्मिक गुरु विश्व प्रसिद्ध स्वामी विवेकानन्द जी का जन्म 12 जनवरी 1863 को कोलकाता के एक कुलीन बंगाली कायस्थ परिवार में हुआ था। स्वामी विवेकानंद जी का वास्तविक नाम नरेंद्र नाथ दत्त था।उन्होंने अमेरिका स्थित शिकागो में 11 सितंबर 1893 में आयोजित विश्व धर्म महासभा में भारत की ओर से सनातन धर्म का प्रतिनिधित्व किया था। भारत के धर्म संस्कृति, आध्यात्मिकता से परिपूर्ण वेदांत दर्शन अमेरिका और योरोप के हर एक देश में स्वामी विवेकानंद जी के उत्कृष्ट सम्मोहनीय भाषण के द्वारा ही पहुँचा। उन्होंने ही रामकृष्ण मिशन की स्थापना किया था,जो आज भी अपना काम कर रहा है। उनके गुरु राम कृष्ण देव थे। वे अपने गुरु से बहुत प्रभावित थे। स्वामी जी अपने गुरु के एक विद्वान, सुयोग्य,सदाचारी,परमप्रिय व महान शिष्य थे। स्वामी जी ने अपने गुरु से यह भी सीखा कि सारे जीवों में स्वयं परमात्मा का वाश होता है, उसी का अस्तित्व है। इस लिए मानव के रूप में जन्मे हुए जो मनुष्य दूसरे जरुरतमंदों की मदद या सेवा करते है तो इसके द्वारा परमात्मा की भी सेवा की जा सकती है।

अपने गुरु रामकृष्ण की मृत्यु के बाद विवेकानंद ने बड़े पैमाने पर भारतीय उपमहाद्वीप का सघनतम दौरा किया और ब्रिटिश भारत में मौजूदा विभिन्न स्थितियों-परिस्थितियों का प्रत्यक्ष पूर्ण ज्ञान प्राप्त किया। इसके बाद 30 वर्ष की आयु में विश्व धर्म संसद 1893 में भारत के हिन्दू धर्म-सनातन धर्म का प्रतिनिधित्व करने संयुक्त राज्य अमेरिका के शहर शिकागो के लिए प्रस्थान किया।

शिकागो के विश्व धर्म सम्मलेन में बोलने के लिए विवेकानन्द जी को आयोजकों द्वारा मात्र 2 मिनट का ही समय दिया गया था। स्वामी जी ने सनातन धर्म पर अपने भाषण की शुरुआत करते इसके पहले महासभा में उपस्थित विद्वानों और जन समूह को अपने संबोधन में “मेरे अमेरिकी प्रिय भाई एवं बहनों” कह कर सस्नेह, सहृदयतापूर्ण, आदरपूर्वक संबोधन किया। स्वामी जी के इस प्रथम वाक्य ने ही वहाँ उपस्थित सभी लोगों का दिल जीत लिया था। अपने भाषण के द्वारा हिन्दू और सनातन धर्म को विश्व में सार्वभौमिक पहचान दिलवायी। स्वामी विवेकानंद जी ने संयुक्त राज्य अमेरिका,इंग्लैण्ड और यूरोप में हिन्दू दर्शन के सिद्धांतों का वृहद् प्रचार प्रसार किया और कई निजी तथा सार्वजनिक व्याख्यानों का आयोजन किया।

भारत में विवेकानंद जी को एक देश भक्त युवा सन्यासी के रूप में माना जाना जाता है और उनके जन्म दिवस 12 जनवरी को राष्ट्रीय युवा दिवस के रूप में बड़े उत्साह और श्रद्धा के साथ मनाया जाता है। यहाँ तक कि राष्ट्रीय युवा दिवस से एक सप्ताह तक 12 जनवरी से 18 जनवरी तक राष्ट्रीय युवा सप्ताह के रूप में बड़े हर्ष व उल्लास के साथ मनाया जाता है,जिसका समापन 19 जनवरी को किया जाता है।

गुरुदेव रविंद्र नाथ टैगोर ने एक बार कहा था कि  “यदि आप भारत को जानना चाहते हैं,तो स्वामी विवेकानंद जी को पढ़िए। उनमें आप सब कुछ सकारात्मक ही पाएंगे, नकारात्मक कुछ भी नहीं।

रोमां रोलां ने स्वामी जी के बारे में कहा था,उनके द्वितीय होने की कल्पना करना भी असंभव है। वे जहाँ भी गए वहाँ सर्वप्रथम ही रहे।अद्वितीय ही रहे। हर कोई उनमें अपने नेता का दिग्दर्शन करता था।स्वामी जी ईश्वर का एक प्रतिनिधि रूप थे। सब पर अपना प्रभुत्व प्राप्त कर लेना ही उनकी अपनी विशिष्टता थी।

हिमालय प्रदेश में एक बार एक अनजान यात्री स्वामी जी को देख ठिठक कर रुक गया,और आश्चर्यपूर्वक चिल्ला उठा ! “शिव”। यह तो कुछ ऐसा हुआ मानो उस व्यक्ति के आराध्य देव ने अपना स्वयं का नाम उसके माथे पर लिख दिया हो।

स्वामी विवेकानंद जी केवल एक वेदांत और सनातन धर्मी सन्त ही नहीं, वह एक अग्रणी महान देशभक्त, प्रखर वक्ता, उत्कृष्ट लेखक, प्रेरक व्यक्ति, उच्च विचारक के साथ ही साथ एक मानव प्रेमी भी थे। अमेरिका से लौट कर उन्होंने देश वासियों का आह्वान करते हुए कहा था “नया भारत निकल पड़े मोची की दुकान से,भड़भूजें की भाड़ से, हाट से, बाजार से, कारखाने से, निकल पड़े झाड़ियों, जंगलों, पर्वतों, पहाड़ों से” और इस जनमानस पर स्वामी जी के पुकार का असर पड़ा उसने उत्तर दिया। जनता गर्व के साथ निकल पड़ी। महात्मा गांधी को आजादी की लड़ाई में जो जन समर्थन मिला वह वास्तव में देखा जाये तो विवेका नन्द के आह्वान का ही फल था। इस प्रकार देखा जाये तो स्वामी विवेकानंद जी भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के भी एक प्रमुख प्रेरणा के स्रोत बने। उनका विश्वास था भारतवर्ष धर्म एवं दर्शन की पुण्य भूमि है। यहीं बड़े बड़े ऋषियों मुनियों व महात्माओं का जन्म हुआ। यही सन्यास एवं त्याग की भूमि है तथा यहीं केवल यहीं आदि काल से लेकर आज तक मनुष्य के लिए जीवन के सर्वोच्च आदर्श एवं मुक्ति का द्वार खुला हुआ है। स्वामी विवेकानन्द के कथन-

“उठो,जागो,स्वयं जाग कर औरों को जगाओ। अपने मनुष्य जन्म को सफल करो और तब तक नहीं रुको,जब तक लक्ष्य प्राप्त न हो जाये”

उन्नीसवीं शताब्दी के आखिरी वर्षों में विवेकानन्द जी लगभग सशस्त्र या हिंसक क्रांति के जरिये भी देश को आजाद कराना चाह रहे थे,किन्तु उनको जल्द ही यह विश्वास भी हो गया था कि वर्तमान परिस्थितियाँ अभी उन इरादों के लिए परिपक्व नहीं हैं। इसके बाद ही स्वामी विवेकानन्द जी ने “एकला चलो” की नीति का पालन करते हुए एक परिव्राजक के रूप में भारत और पूरी दुनिया को खंगाल डाला। उन्होंने कहा था मुझे बहुत से युवा सन्यासी चाहिए जो भारत के ग्रामों में फ़ैल कर देशवासियों की सेवा में खप जायें। यद्यपि कि उनका यह सपना पूरा नहीं हुआ। विवेकानन्द जी पुरोहितवाद, धार्मिक आडम्बरों, कठमुल्लापन और रूढ़िवादी विचारों के सख्त खिलाफ थे। उन्होंने धर्म को मनुष्य के केन्द्र में रखकर ही आध्यात्मिक चिंतन किया था। उनका हिन्दू धर्म अटपटा और लिजलिजा तथा वायवीय नहीं था। उन्होंने यह विद्रोही बयान दिया था कि इस देश के तैंतीस करोड़ भूखे, दरिद्र और कुपोषण के शिकार लोगों को देवी देवताओं की तरह मंदिरों में स्थापित कर दिया जाये और मंदिरों से देवी देवताओं की मूर्तियां को हटा दिया जाये।
स्वामी विवेकानन्द जी का यह कालजयी आह्वान इक्कीसवीं सदी के पहले दशक के अन्त में एक बड़ा प्रश्नवाचक चिन्ह खड़ा करता है। उनके इस आह्वान को सुनकर पूरे पुरोहित वर्ग की घिघ्घी बंध गयी थी। आज कोई दूसरा साधू तो क्या सरकारी मशीनरी भी किसी अवैध मंदिर की मूर्ति को हटाने का जोखिम नहीं उठा सकती। स्वामी जी के जीवन की अन्तर्लेय यही थी कि वे इस बात से आश्वस्त थे कि धरती की गोद में यदि ऐसा कोई देश है जिसने मनुष्य की हर तरह की बेहतरी के लिए ईमानदार कोशिशें की है तो वह वास्तव में भारत ही है।
उन्होंने पुरोहितवाद, ब्राह्मणवाद, धार्मिक कर्मकांड और रूढ़ियों की खिल्ली भी उड़ाई और लगभग आक्रमणकारी भाषा में ऐसी विभिन्न विसंगतियों के खिलाफ युद्ध भी किया। उनकी दृष्टि में हिन्दू धर्म के सर्वश्रेष्ठ चिन्तकों के विचारों का निचोड़ पूरी दुनिया के लिए अब भी ईर्ष्या का विषय है।

स्वामी जी ने संकेत दिया था कि विदेशों में भौतिक समृद्धि तो है और उसकी भारत को जरुरत भी है लेकिन हमें कभी भी याचक नहीं बनना चाहिए। हमारे पास उससे ज्यादा बहुत कुछ है जिसको हम पश्चिम को दे सकते हैं और वास्तव में पाश्चात्य देशों को उसकी नितान्त आवश्यकता भी है। यह बात कहना स्वामी जी का अपने देश की धरोहर के लिए उनका बड़बोलापन या दम्भ नहीं था। यह एक वेदान्ती साधु की भारतीय सभ्यता और संस्कृति की तटस्थ, वस्तुपूरक, आवश्यक और मूल्यगत आलोचना थी। बीसवीं सदी के इतिहास ने बाद में स्वामी जी की उसी बात पर अपनी मुहर लगाई। स्वामी जी के ओजस्वी और सारगर्भित व्याख्यानों की प्रसिद्धि सम्पूर्ण विश्व में है। जीवन के अंतिम दिन उन्होंने शुक्ल यजुर्वेद की व्याख्या की और कहा “एक और विवेकानन्द चाहिए,यह समझने के लिए कि इस विवेकानन्द ने अब तक क्या किया है।”

उनके शिष्यों के अनुसार जीवन के अंतिम दिन 4 जुलाई 1902 को भी उन्होंने अपनी ध्यान करने की दिनचर्या को नहीं बदला और प्रातः नित्य की भांति ही 2-3 घण्टे ध्यान योग किया और ध्यानावस्था में ही अपने ब्रह्मरंध्र को भेदकर महासमाधि ले ली। बेलूर में गंगा नदी के तट पर चन्दन की चिता पर उनकी अंत्येष्टि की गयी। इसी गंगा तट के दूसरी ओर उनके गुरु श्री रामकृष्ण परमहंस का सोलह वर्ष पूर्व अंतिम संस्कार हुआ था। उनके शिष्यों और अनुयायियों ने स्वामी जी की स्मृति में वहाँ एक मंदिर बनवाया और समूचे विश्व में विवेकानन्द जी व उनके गुरु रामकृष्ण परमहंस जी के विचारों और संदेशों को प्रचारित प्रसारित करने के लिए 130 से अधिक केन्द्रों की स्थापना किया, जो आज भी चल रहे हैं।

स्वामी जी के बारे में जितना भी लिखा जाय वह कम है। उनके अनेकों और भी दृष्टान्त और विचार हैं जो उनके दर्शन के बारे में हमें गहरी जानकारी देते हैं,किन्तु सभी संदेशों, वृतांतों का एक छोटे से लेख में वर्णन कर समाहित करना संभव नहीं हैं। विवेकानन्द जी ऐसे महान व्यक्तित्व के पूज्यनीय स्वामी थे। आदर्श युवा साधु थे, वेदांत के प्रकाण्ड विद्वान, प्रखर वक्ता थे। ओजस्वी विचारक, धर्म व दर्शन के ज्ञाता एवं भारतवर्ष के गौरव थे।

स्वामी विवेकानंद जी की जीवनी यह बताती है कि स्वामी जी मात्र 39 वर्ष की ही अल्पायु में जो कार्य कर गये वे आने वाली अनेक शताब्दियों तक हमारी आने वाली पीढ़ियों का भी मार्गदर्शन करती रहेंगी तथा सदैव अनुकरणीय रहेगी। स्वामी विवेकानन्द जी के पुण्य तिथि दिवस 4 जुलाई की इस पावन बेला पर मैं अपने हृदय के अनंत श्रद्धा पुष्प उन्हें सादर समर्पित कर शत शत नमन करता हूँ और उनके दिखाये मार्ग और दर्शन पर चलने का संकल्प लेता हूँ ।