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सुपौल/ बीरपुर का “कुत्तों का भोजन पात्र” : संवेदना, औपचारिकता या सरकारी मद के रकम की बंदरबांट ?

बीरपुर (सुपौल) : किसी भी सभ्य समाज की पहचान इस बात से होती है कि वह अपने उन बेजुबान जीवों के प्रति कितना संवेदनशील है, जो भूख और प्यास के लिए पूरी तरह इंसानी दया पर निर्भर हैं। बिहार के नगर पंचायत बीरपुर (वार्ड नं-04) से सामने आई यह तस्वीर इस संवेदनशीलता पर गंभीर सवालिया निशान लगाती है। वहां आवारा कुत्तों के लिए लगाए गए ‘भोजन पात्र’ की बदहाली यह बताने के लिए काफी है कि प्रशासन की योजनाएं धरातल पर उतरते ही कैसे दम तोड़ देती हैं।

​निश्चित रूप से, बेसहारा कुत्तों के लिए भोजन की व्यवस्था करना एक सराहनीय और मानवीय सोच है। लेकिन जब उस भोजन पात्र की स्थिति कचरे के ढेर जैसी हो जाए, तो इसे सेवा कहें या बेजुबानों के साथ किया गया एक ‘भूरू का भद्दा मजाक’? तस्वीर स्पष्ट करती है कि जिसे कुत्तों का पेट भरने के लिए बनाया गया था, वह आज प्लास्टिक की थैलियों, दुर्गंध और गंदगी का केंद्र बन चुका है। यह स्थिति न केवल पशुओं के लिए जानलेवा है, बल्कि सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए भी एक बड़ा खतरा है।

​यहाँ सवाल प्रशासन की नीयत और नीति दोनों पर उठते हैं। क्या केवल लोहे का एक ढांचा खड़ा कर देना और उस पर भारी-भरकम शब्दों में ‘भोजन पात्र’ लिखवा देना ही जिम्मेदारी की इतिश्री है? यदि उस पात्र की नियमित सफाई नहीं हो रही, यदि वहां प्लास्टिक मुक्त भोजन सुनिश्चित नहीं किया जा रहा, तो यह योजना पशु-कल्याण के नाम पर महज एक सरकारी खानापूर्ति से अधिक कुछ नहीं है। सड़े-गले कचरे और प्लास्टिक के बीच भोजन ढूंढते कुत्ते संक्रमण का शिकार हो रहे हैं, जो अंततः रेबीज जैसी बीमारियों के प्रसार का कारण भी बन सकता है।

​संविधान का अनुच्छेद 51A (g) हमें हर जीव के प्रति दया भाव रखने का निर्देश देता है। नगर प्रशासन को यह समझना होगा कि ऐसी योजनाओं की सफलता उसके रखरखाव (Maintenance) में छिपी होती है, केवल निर्माण में नहीं। इसके साथ ही, समाज को भी अपनी भूमिका पहचाननी होगी। जो नागरिक इसे कूड़ेदान समझकर इसमें कचरा फेंक रहे हैं, वे अपनी नागरिक जिम्मेदारी से भाग रहे हैं।

​समय आ गया है कि नगर पंचायत बीरपुर इस दिशा में ठोस कदम उठाए। इस भोजन पात्र को कचरे से मुक्त कर इसे एक आदर्श ‘फीडिंग पॉइंट’ में तब्दील किया जाए। स्थानीय स्वयंसेवकों और पशु-प्रेमियों को इस मुहिम से जोड़ना एक बेहतर विकल्प हो सकता है। प्रशासन को याद रखना चाहिए कि बेजुबानों के नाम पर कागजी खानापूर्ति करना न केवल नैतिक रूप से गलत है, बल्कि यह उस पद की गरिमा के भी खिलाफ है जो जनकल्याण की शपथ लेकर संभाला जाता है।

​व्यवस्था ऐसी हो जो जीवन बचाए, न कि गंदगी और बीमारियों को दावत दे।

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