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कविता/ आज का देखो ज़माना

✍️ सविता गर्ग “सावी”
(कवयित्री, गीतकार, गायिका)
पंचकूला (हरियाणा)

आज का देखो ज़माना
कोई लाख है कोई राख है
नेक पाता ठोकरें और
ज़ालिमों की साख है।

हर तरफ फैली मक्कारी
बढ़ रही कालाबाज़ारी
घर में ही हैवान पलते
कहाँ सुरक्षित है अब नारी
हाथ में जिसके है लाठी
बस उसी की धाक है
आज का देखो ज़माना
कोई लाख है कोई राख है।

डोल रहा है दीन ईमान
बड़ों का नहीं रहा सम्मान
चाहे बुरी हो चाहे अच्छी
हर कोई चाहता है पहचान
बलि चढ़ी है संस्कारों की
जैसे कोई मज़ाक है
आज का देखो ज़माना
कोई लाख है कोई राख है।

चारों ओर बिछा है जाल
इंसानों के मिलते कंकाल
सज़ा नहीं पाते अपराधी
बने हुए जी का जंजाल
रणचंडी बन कूद पड़ो
माँ ये कैसा इंसाफ है
आज का देखो ज़माना
कोई लाख है कोई राख है
नेक पाता ठोकरें और
ज़ालिमों की साख है।

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