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कविता/ पावस गीत

✍️ सुधांशु पांडे “निराला”,
      प्रयागराज, उत्तर प्रदेश

 

काले-काले बादल में
जैसे बूँद समाई हो!
तुम्हीं हमारे जीवन की
सच्ची अमिट कमाई हो!

सिर्फ तुम्हारे आने से
पल्लव आया ठंडक आई;
चाहे जो कर,दे बस कर दे
फटे हुए मन की तुरपाई;

मुझको अस्त-व्यस्त करके
बेहद सजी सजाई हो!

तपन,उदासी,बेचैनी
किस-किस को गले लगाऊँ;
कितनी पीड़ा सहन करूं?
अब,कितनी पीड़ा गाऊँ;

यही छोड़कर जाना तुम
जो नूतनता लाई हो!

शांत करो तड़पन मेरी
कुछ तो अलख जगाआे;
धरती झूमे अंबर झूमे
ऐसा राग सुनाओ;

उस पर बीत रही है क्या?
जिसको हँसकर बहलाई हो!

तुमसे ही गुलशन महका
आैर महक उठे गलियारे;
चेतनता फिर से जागी
ठट्ठा करते हुए उजियारे;

सच-सच बोलो और कहाँ
निज को यूं फैलाई हो!

उसी पुरानी मिट्टी से
सोंधी-सोंधी महक उठे;
और किसी को लूटी हो
या तुमसे बस हमी लूटे;

कभी यहाँ पर कभी वहाँ
चलती फिरती तरुणाई हो!

हरी-भरी शाखाओं से
पीहू-पीहू की टेर लगे;
सिरनामा बतला दो फिर
गर आने में देर लगे;

तुम में सब खोना चाहे
तुम ऐसी गहराई हो!

आई हो जिस तरह झूम के
हरदम ऐसे आना तुम;
यह तेरा पीहर है प्यारी
और कहीं शर्माना तुम;

जाने दो तुम मत तड़पो
भले मुझे तड़पाई हो!

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