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सहरसा/ फाइलेरिया नियंत्रण तथा कालाजार को लेकर उन्मुखीकरण कार्यशाला का हुआ आयोजन

फाइलेरिया तथा कालाजार के लक्षण से लेकर बचाव और कारण के बारे में विस्तृत रूप से की गई चर्चा

ज़िले में फाइलेरिया हाथीपांव के 1057 एवं हाइड्रोसील के 475 मरीज़ चिह्नित

सहरसा : फाइलेरिया को दुनिया की दूसरे नंबर की बीमारी माना गया है ,जो बड़े पैमाने पर लोगों को विकलांग बना देती । लिंफेटिक फाइलेरियासिस को ही आम बोलचाल की भाषा में फाइलेरिया कहा जाता है। फाइलेरिया हालांकि किसी की ज़िंदगी तो नहीं लेती है, लेकिन जिंदा आदमी को मृत समान बना देती है। इस बीमारी को हाथीपांव के नाम से भी जाना जाता है। अगर समय पर फाइलेरिया की पहचान कर ली जाए तो जल्द इलाज शुरू किया जा सकता है। फाइलेरिया नियंत्रण तथा कालाजार कार्यक्रम के अंतर्गत ज़िले के सभी प्रभारी चिकित्सा पदाधिकारी, चिकित्सा पदाधिकारी एवं उन्मूलन कार्यक्रम में सहयोग दे रहे स्वास्थ्य विभाग के पदाधिकारियों और कर्मियों का एक दिवसीय उन्मुखीकरण कार्यशाला का आयोजन रेडक्रास में डब्ल्यूएचओ के सहयोग से किया गया। इसका विधिवत उद्घाटन सिविल सर्जन डॉ किशोर कुमार मधुप, डीएमओ डॉ रविन्द्र कुमार, एसीएमओ डॉ रविन्द्र मोहन, डब्ल्यूएचओ के क्षेत्रीय समन्वयक डॉ दिलीप कुमार के द्वारा संयुक्त रूप से दीप प्रज्जवलित कर किया गया। इस अवसर पर ज़िले के सभी एमओआईसी, एमओ, बीएचएम, वीबीडीएस, डीवीबीडीसीओ, वीसी केयर इंडिया सहित कालाजार एवं फाइलेरिया विभाग के सभी अधिकारी एवं कर्मी उपस्थित थे।

इस अवसर पर सिविल सर्जन डॉ किशोर कुमार मधुप ने बताया कि विभागीय स्तर पर अभी तक अपने ज़िले में फाइलेरिया मरीजों की संख्या 1532 जिसमें हाथीपांव के 1057 एवं हाइड्रोसील के 475 मरीज़ों को चिह्नित किया गया है । हाइड्रोसील रोगी का सरकारी संस्थान मे मुफ्त मे आप्रेशन किया जाता तथा हाथीपांव रोगी को अपने प्रभावित अंग के रखरखाव हेतु सेल्फ केयर किट एव प्रशिक्षण दिया जाता है ।

डब्ल्यूएचओ के क्षेत्रीय समन्वयक डॉ दिलीप कुमार ने बताया कि आमतौर पर फाइलेरिया के कोई लक्षण स्पष्ट रूप से दिखाई नहीं देते हैं। लेकिन बुखार, बदन में खुजली के अलावा पुरुषों के जननांग और उसके आस-पास दर्द के साथ ही सूजन की समस्या दिखाई देती है। इसके अलावा पैरों और हाथों में सूजन, हाथीपांव और हाइड्रोसिल (अंडकोषों की सूजन) भी फाइलेरिया के मुख्य लक्षण हैं। चूकि इस बीमारी में हाथ और पैर हाथी के पांव जैसे सूज जाते हैं। इसलिए इस बीमारी को हाथीपांव कहा जाता है। फाइलेरिया के लक्षण कई सालों तक नजर नहीं आते हैं। फाइलेरिया न सिर्फ व्यक्ति को विकलांग बनाता है बल्कि इससे मरीज की मानसिक स्थिति पर भी बुरा प्रभाव पड़ता है।

फाइलेरिया से ग्रसित मरीजों के लिए स्वउपचार के तरीक़े:

-स्वच्छ एवं ताज़े पानी से पैर की अच्छी तरह से सफ़ाई करनी चाहिए।
-मुलायम या हल्के तौलिए से पांव को सुखाना चाहिए।
-हाथी पांव के कारण पैर की अंगुलियों में पड़ी दरारें में दवा लगानी  चाहिए।
-पैर को हमेशा ऊपर उठा कर रखना चाहिए।
-सोते समय पैर के नीचे 2 से 3 तकिया लगाना चाहिए।
-पैर के अंगूठे के ऊपर पूरा भार देकर निरंतर अभ्यास करना चाहिए।

जिला वेक्टर जनित रोग पदाधिकारी डॉ रविन्द्र कुमार ने बताया कि जिले में वर्ष 2022 के जनवरी तक कालाजार मरीजों की संख्या- 25 है। इसमें कालाजार में विसरल लिशमैनियासिस (वीएल) के 10, पोस्ट कालाजार डर्मल लिशमैनियासिस (पीकेडीएल) के 15 मरीज़ों है । पूरे विश्व में लगभग 20 से अधिक कई प्रकार के लिशमैनिया परजीवी हैं जिसको फ़ैलाने में 90 प्रकार की सैंडफ्लाई कालाजार बीमारी का कारण बनती हैं। लोगों को यह बीमारी सैंडफ्लाइज़ के काटने से ही होती है जो खुद परजीवी से संक्रमित किसी दूसरे व्यक्ति का खून पीने वाले परजीवी हो जाते हैं।

प्रभारी अपर मुख्य चिकित्सा पदाधिकारी सह प्रभारी गैर संचारी रोग पदाधिकारी, डा. रविन्द्र मोहन ने बताया कि कालाजार रोग की जांच एवं उपचार को लेकर जिला स्तरीय प्रशिक्षण कार्यक्रम का आयोजन किया गया है। कालाजार उन्मूलन के तहत शत-प्रतिशत लक्ष्य प्राप्त करने के लिए स्वास्थ्य विभाग द्वारा राज्य स्तर पर विशेष रूप से सघन कार्य योजना- 2022 बनायी गयी है। इसके तहत स्थानीय ज़िले के चिकित्सा पदाधिकारियों, जीएनएम एवं एएनएम को प्रशिक्षित किया जा रहा है। कालाजार को जड़ से मिटाने के लिए हम सभी को निष्ठावान बनकर कार्य करने के आवश्यकता है। ज़िले के कुछ ही प्रखंडों में कालाजार के मरीज शेष बचे हुए हैं, इसका भी सफाया हो जाएगा। उन्होंने बताया कि स्वास्थय कर्मियों द्वारा लोगों को मच्छरदानी का नियमित उपयोग करने एवं अपने घर के आसपास गड्ढों या नालों में बरसात या चापाकल के पानी की निकासी करने के लिए जागरूक करें ताकि कालाजार के मच्छरों की संख्या नहीं बढ़े।

कालाजार के मुख्य लक्षण:

-दो या दो सप्ताह से अधिक दिनों तक बुख़ार लगना।
-भूख न लगना।
-वजन कम होना।
-पैर, पेट, चेहरे और हाथ की त्वचा का रंग हल्का हो जाना।
-इस बीमारी में भूख न लगना, पीलापन और वजन घटने के कारण कमज़ोरी आती हैं।
-खून की कमी।
-अक्सर तिल्ली और क़भी-क़भी लिवर बढ़ जाने के कारण पेट फूल जाता हैं।
-अगर समय रहते इसका इलाज़ नहीं किया गया तो मरीज की जान जा सकती है। कालाजार को अक्सर लोग मलेरिया, टायफाइड या तपेदिक समझने की भूल कर बैठते हैं।

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