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डायलिसिस डायरी विशेषांक/ वर्ल्ड किडनी डे के उपलक्ष्य में अनुभव आधारित गुर्दा संबंधित रोगों पर विशेष संवाद “Living Well With Kidney Disease”

✍️ अनिल कुमार श्रीवास्तव

 

डायलिसिस डायरी अंतर्गत विशेषांक के जानकारीपरक विचार को पाठकों ने भी खूब सराहा है । उत्साहवर्धन के रूप में टिप्पणी और लाइक सोशल साइट्स पर सामान्य रही लेकिन रीच ( पहुंचने) की स्ट्रेंथ इस विचार की लगभग 10 हजार रही है। मेरे लिए इतना ही काफी है कि जब कोई नया, जो मेरा शुरू से प्रयास रहा है कि लीक से थोड़ा हटकर विचार परोसा जाय चाहे वो पहले अखबार की दुनिया रही हो या आभासी दुनिया की यह शोषल साइट्स, करता हूं तो आप सब का अपार स्नेह, आशीष व सहयोग मिलता रहा है उम्मीद है आगे भी मिलता रहेगा।

गुर्दा फेल होने के कारण

गुर्दा फेल बहुत गम्भीर व असाध्य रोग है डायलिसिस की गिरफ्त में आया हर रोगी शारीरिक, आर्थिक व मानसिक त्रस्त हो ही जाता है क्योंकि यह मंहगे होने के साथ साथ कोई स्थायी हल नही देता। मैं समझता हूं इसकी गिरफ्त में आये हर व्यक्ति की दशा खराब ही होती है उनमें से एक मैं भी हूं यह बात अलग है कि घर से बेहद दूर परदेश में होने और अपने छोटे से परिवार का मुखिया होने के कारण मेरी दशा कुछ ज्यादा ही ….. मुझे लगता है लगातार संस्मरण से आप लोग बोर होने लगे होंगे इसलिए आज के पन्ने में कुछ अनुभव आधारित जानकारी की बातें हो जाएं। जैसा कि आप लोगो को पूर्व में बता चुका हूं शरीर का छन्ना गुर्दा होता है जो हमारे रक्त को छानने का काम करता है और रक्त में अच्छी चीजों को महत्वपूर्ण आंतरिक अंगों को और बेकार चीजो को बाहर का रास्ता दिखाता है। इस काम को करने के लिए नेफ्रॉन नाम की लग्भग 1 मिलियन इकाइयां होती हैं जो किसी भी अन्य बीमारी से प्रभावित हो सकती हैं।


अनियंत्रित रक्तचाप, मधुमेह जैसी बीमारी तो गुर्दे के लिए काल कही जा सकती हैं। लोग कहते हैं कि नशा करने से ही गुर्दे खराब होते हैं तो आपको बता दूं कि यह जरूरी नही तमाम ऐसे सहमित्रो से मिला हूं जिन्होंने जीवन मे कभी नशा हांथ नही लगाया और डायलिसिस पर हैं। हा नशे से भी गुर्दे खराब होते हैं लेकिन नशे से ही नही। गुर्दा खराब होने के सबसे ज्यादा कारण दूषित खान पान से देखने को मिलते हैं। अब उसमें नशा हो, मिलावटी खाना पानी, गन्दा पानी, या किसी प्रकार का दूषित खाद्य पेय, दवाइयां आदि .. । जब हम कुछ भी खाते पीते हैं तो तरल रूप में छांटने का काम गुर्दे पर ही पड़ता है और अधिक गंदगी से ज्यादा लोड होता है जो छांटते छांटते बेदम हो जाते हैं और उसके छिद्र रुंधने लगते हैं उदाहरणार्थ फिल्टर। हमारे यहां नुस्खों का जबरदस्त बोलबाला है हर घर मे दो चार डॉक्टर तो होते ही है। और घर के बाहर झोलाछाप डॉक्टरों, नीम हकीम, बाबा आदि की पूछिये ही मत, कहीं कहीं तो मेडिकल स्टोर वाले भी पुड़िया बांध देते हैं। अगर बुखार या दर्द आ रहा है तो व्यक्ति सस्ते के चक्कर मे तरह तरह के नुस्खे आजमाता है, कभी कभी ठीक भी हो जाता है। यह नही जानने की कोशिश करता कि यह कोई संकेत हो सकता है। वह अगर ठीक भी हो जाता है तो हाई पावर की दवा से गुर्दो के साथ अन्याय कर रहा होता है। थोड़ी मजबूरी भी कह लीजिये अगर बड़े डॉक्टर के पास गया तो वह बिना जांच के पैरासिटामोल के अलावा कुछ भी नही देंगे वो भी हल्के पावर की। अब उनकी फीस फिर जांच और ऊपर से लम्बा इलाज यानी कम से कम 3 या पांच दिन का। अब जानिए इसके पीछे वजह यह होती है कि बड़े डॉक्टर बड़ी पढ़ाई, उनकी नजर आंतरिक अंगों को सुरक्षित रखने पर होती है और वह धीरे धीरे बुखार कम करते हैं ताकि साइड इफेक्ट न हो और आंतरिक अंग सुरक्षित रहें लेकिन झोलाछाप बेहद सस्ते और सस्ती गोलियों से एक झटके में बुखार रात भर में गायब उन्हें आंतरिक अंगों से कोई मतलब नही। फौरी तौर पर उनका इलाज कामयाब हो जाता है और इंसान सुबह ही दिनचर्या में बिजी। नीम हकीम, बाबा आदि तो इससे भी करिश्माई होते हैं। कभी कभी बच्चे गर्भ में होते हैं उस समय ही उनके गुर्दे सही से विकसित नही हो पाते जो बाद में तकलीफदेह होते हैं। इसके अलावा बधिक मूत्र प्रवाह से गुर्दे फेल हो सकते हैं। मलेरिया, पीत ज्वर और अन्य ज्वर भी गुर्दे के लिए कभी कभी घातक साबित होते हैं। एक मरीज से मैंने पूंछा आपका गुर्दा कैसे खराब हो गया तो उसने बताया किडनैपिन से अब मैं भौचक्का रह गया और हंसने लगा। लेकिन उसने गम्भीरता से बताया कि श्रीवास्तव जी मैं सही कह रहा हूँ। मैंने जिज्ञासा से पूछा तो उसने बताया उसका भाई पूर्व विधायक है और वह नामचीन घराने से ताल्लुक रखता है। उसको विरोधियों ने किडनैप किया था और बेहोसी के इंजेक्शन के साथ जाने कौन कौन से इंजेक्शन दिए फिर अधमरा कर उसे मरा जानकर जंगलों में छोड़ दिया बाद में अस्पताल में इलाज चला और वहां डॉक्टरों ने उसे तो बचा लिया मगर उसके गुर्दो को मृत घोषित कर दिया। अब आप लोग यह जरूर जानना चाहते होंगे कि मेरे गुर्दे कैसे फेल हुए। मेरा भीषण एक्सीडेंट हुआ था उस समय गुर्दे रोग से भी अनजान था। इलाज चला और ठीक भी हो गया था लेकिन उसके चार पांच साल बाद गुर्दे फेल हुए थे। पूछने पर डॉक्टर्स ने बताया था दवाइयों का साइड इफेक्ट ही था। और मुझे लगता है लग्भग चार साल गुर्दो ने पूरी वीरता से खींचे थे। और मैं ठहरा मध्यमवर्गीय गुर्दा जांचों या रोगों का आमतौर पर इतना सुनने को भी नही मिला था। वो तो जब पता चला जब वो सिकुड़ गए। खैर यह कारण बताने का मेरा उद्देश्य सिर्फ इतना था कि जो इसकी जद में नही आये हैं वो सावधान रहें, सतर्क रहें और सुरक्षित रहें क्योंकि यह बीमारी बहुत ही घातक व असाध्य है। खैर मैं तो खुद को खुश रखने के लिए इसे शाही बीमारी का नाम देता हूँ। बाकी अधिक जानकारी के लिए अपने डॉक्टर्स से परामर्श लेते रहें वो आपको आधिकारिक और स्वास्थ्य तकनीकी जानकारी देंगे।

किडनी खराब होने के लक्षण

आइए आगे का संवाद एक ऐसी जानकारी पर केंद्रित करते हैं जो लोकोपयोगी है। अब बात करते हैं कि सामान्य तौर पर डॉक्टर
* शरीर पर सूजन खासकर चेहरा, पेट, पैर, आदि स्थानों पर,
* शरीर मे अनियंत्रित रक्तचाप व शर्करा,
* ज्यादा समय से असमान्य स्वाद, भूंख की कमी, उलटी, मितली आदि लक्षणों को लेकर गुर्दा रोग के प्रति गम्भीर हो जाते हैं।

अब ठहरा डायलिसिस मरीज तो सहमरीजो से भी बात करने पर गुर्दा खराब होने के लग्भग यही लक्षण पता चले जो अनुभव के आधार पर आज लिख रहा हूँ।जब शरीर मे कमजोरी, थकान महसूस हो और कमजोरी लगे तो यह गुर्दा बीमारी के संकेत तो सकते हैं। बार बार पेशाब आये, पेशाब में जलन हो या पेशाब में रक्त आये तो भी गुर्दा रोग के संकेत हो सकते हैं। त्वचा खुरदरी लगे, तवचा में जलन हों, नाखून में सफेदी बढ़े, जोड़ो के रंग में परिवर्तन यह भी गुर्दा रोग की निशानियां हैं। जोड़ों में अक्सर दर्द हो खासतौर पर उंगली अंगूठों के या पेशाब का रंग सामान्य से अलग यानी बिना की दवाई खाने के ज्यादा पीला या गाढ़ा हो तो भी गुर्दा रोग के लक्षण हो सकते हैं। इसके अलावा चक्कर, उलटी, हाई बीपी, सुस्तपन, कमजोरी, चिड़चिड़ापन आदि आदि तो इस बीमारी के संकेत व लक्षण तो कहे ही जा सकते हैं। लिहाजा इन लक्षणों को नजरंदाज न करके चिकित्सक से परामर्श जरूर लें ताकि समय रहते चिकित्सक इसे नियंत्रित कर गुर्दो को अभयदान दे सकें।

इस दौरान बहुत से लोग इन लक्षणों को किसी बड़ी भयावहता का संकेत न मानकर घर की डॉक्टरी व झोलाछाप डॉक्टरों के नुस्खों में फंसकर अपनी किडनियों पर और अधिक जुल्म ढहाते हैं फलस्वरूप तमाम चुनौतियों को झेलते झेलते किडनियां शहीद हो जाती हैं। एक तो किडनी पहले से ही किसी दिक्कत में होती हैं जिसका संकेत इन लक्षणों के रूप में शरीर दे रहा होता है ऊपर से नुस्खे जिन्हें छानना किडनी को ही पड़ता है तो वह अत्यधिक कार्य पड़ने की दशा में कभी कभी जवाब दे जाती हैं जिन्हें डॉक्टरों की भाषा मे किडनी फेल भी कह सकते हैं और मरीज इस असाध्य रोग से पीड़ित होकर डायलिसिस सपोर्ट पर आ जाता है। मेरा आज का संवाद सिर्फ इस बात पर केंद्रित है कि आप लक्षणों को गम्भीरता से पढ़ें यदि कोई आप के आसपास ऐसे लक्षणों का मिले तो उसे काउंसिलिंग कर अच्छे डॉक्टर के पास जाने की सलाह दें ताकि वह झोलाछाप डॉक्टरों या खुद का डॉक्टर बन कर अपनी किडनियों पर जुल्म न करे और न ही अपना भविष्य खराब करे।

तालीम के साथ तजुर्बे की तामील भी है मददगार

मित्रों स्वास्थ्य जागरूकता और जानकारी के उद्देश्य से निकले विचार डायलिसिस डायरी का आधार तजुर्बा और तालीम हैं जो संस्मरण व विशेषांक के रूप में श्रंखलाबद्ध इस डायरी में पिरोया जा रहा है। अगर सकारात्मक तौर पर देखें तो तजुर्बा और तालीम एक दूसरे के पूरक भी हैं। आज बात करते हैं तजुर्बे की उससे पहले एक प्रसंग ध्यान आ गया तजुर्बा से ही सम्बंधित है उसके बाद इस पर विस्तृत बातचीत करेंगे। एक डॉक्टर ने जो बेहद मृदुल और सरल थे उन्होंने अपने दौरे के दौरान कहा था कि एक डॉक्टर से ज्यादा जानकारी एक गम्भीर और असाध्य रोगी को अपने विषय मे होती है लेकिन मैंने समझा डॉक्टर साहब खुश करने के लिए कह रहे होंगे मगर वो गम्भीर थे। उन्होंने कहा कि हम लोग तो एक निश्चित पाठ्यक्रम से शिक्षा लेकर आते हैं और जांचों के आधार पर इलाज करते हैं तजुर्बे के लिए हमको भी प्रेक्टिस करनी पड़ती है। और थोड़ा थोड़ा अंतर हर शरीर मे होता है थोड़ी थोड़ी प्रतिक्रियाएं भी अलग अलग होती हैं। इसके अलावा चलायमान शरीर की स्थिति भी क्षण क्षण बदलती है। और लंबे समय से यह बीमारी झेलकर इलाज करवा रहे मरीजों को अगर थोड़ा बहुत शिक्षित है को अपने शरीर की प्रतिक्रियाओं का भान हो जाता है। क्योंकि वह हर डायलिसिस 4 घण्टे की डायलिसिस में अपने शरीर पर रिसर्च करते हुए यह सहज अंदाजा लगा सकते हैं कि क्या करने से क्या हो रहा बशर्ते टेक्नीशियन सारी गम्भीर परिस्थितियों को नियंत्रित करने के बाद उनसे साझा करें और मरीज आत्मसात करते हुए भविष्य में हिदायतों को ध्यान रखे। इसके अलावा डॉक्टर से मिलने पर मरीज कभी अपनी कोई बात न छिपाएं और डॉक्टर द्वारा सुझाई गयी दवाएं नियमित खाएं। इसका मतलब यह कतई नही होता कि मरीज डॉक्टर बनने का गुमान कर बैठे क्योंकि तमाम ऐसे टेक्निकल फैक्टर होते हैं जो बिना पढ़े या सीखे दिक्कत में डाल सकते हैं। मगर यह बात सही है तजुर्बे से और डॉक्टर की तालीम के संगम (समन्वय ) से डायलिसिस जैसे गम्भीर व असाध्य रोग में स्वास्थ्य को लंबे समय तक स्थिर रखा जा सकता है।

तजुर्बे पर तो हमारी पुरानी स्वास्थ्य सेवाएं ही आधारित थीं जिन पर धीरे धीरे आधुनिक विज्ञान ने भी मोहर लगाई है। मेरे डायलिसिस विषय मे भी एक ऐसा अनुभव मैंने किया जो सामान्य रोगों के लिए भी कहा जाता है। मैंने सुना है पहले जब डॉक्टर नही हुआ करते थे तो हमारे आर्यावर्त में वैध नब्ज पकड़ कर इलाज कर दिया करते थे सम्भवतः आपने भी सुना होगा। हालांकि यह मेरी क्रोनोलॉजी है कहीं जिक्र भी नही और मैं मेडिकल लाइन से ताल्लुक भी नही रखता, मैं अपने असाध्य रोग से मिले तजुर्बे से उस तजुर्बे को देखने का प्रयास कर रहा हूँ जो आधुनिक विज्ञान पर बेहद सटीक बैठता है। चूंकि डायलिसिस मरीज हूं इसलिए रक्तचाप अनियंत्रित रहना आम बात है और इसे चिकित्सको की सलाह पर मेजरमेंट करके नियंत्रित रखना पड़ता है लिहाजा बीपी मशीन रखनी पड़ती है। मेरे पास जापान की बनी ओमरोंन की बीपी मशीन है जिसमे सामान्य बीपी की रेंज 135/85 दे रखी है जो मैनुअल से थोड़ा ऊपर कही जा सकती है। जब मुझे बुखार या इंफेक्शन होता है तो हार्टबीट बढ़ जाती है। अब मैं मेडिकल का तो नही लेकिन फितरत से ठहरा पत्रकार तो हर चीज की तह तक जाने की आदत है। मैंने सोंचा आखिर इंफेक्शन या ज्वर होने पर रक्तचाप तो थोड़ा बहुत लेकिन हार्टबीट क्यों ज्यादा अनियंत्रित हो जाती है ?

….. एक बार ज्वर से पीड़ित था और मैंने बीपी चेक किया तो नियमित डायलिसिस होने व बीपी दवा की वजह से बीपी तो सामान्य दिखा जितना नियमित रहता था लेकिन हार्टबीट असमान्य थी, यही हाल जब ट्रांसप्लांट व ग्राफ्ट रिमूवल के बाद बन गए पेट मे फिस्टुला के दौरान भी था। अब मेरे मन मे यह बात बैठ गयी कि हार्टबीट क्यो तेज हुई। फिर मैं इस निष्कर्ष पर पहुंचा की जब कोई इंफेक्शन शरीर मे होता है तो उसे हमारे शरीर की रक्षा प्रणाली जान जाती है और सफेद खून (डब्ल्यूबीसी) पूरी ताकत से एकत्र होकर उससे लड़कर भगाने का प्रयास करते हैं यानी इम्यून सिस्टम (रोग प्रतिरोधक क्षमता) पूरा प्रयास कर रहा होता है इंफेक्शन से लड़ने का और सामान्य तौर पर इस लड़ाई में हार्टबीट बढ़ना लाजमी है इस लड़ाई में लाल रक्त कर्णिकाए भी सहयोग करती हैं तो बीपी भी प्रभावित होता है। अब इसी क्रोनोलॉजी का आधार पर हमने अंदाजा लगाया कि पहले तजुर्बेकार वैद्य हुआ करते थे जो हांथ की नस देख कर इलाज करते थे। उस समय विज्ञान ने तरक्की नही की थी, जांच के उपकरण मौजूद नही थे। वैद्य आयुर्वेद से वनस्पतियों के माध्यम से इलाज करते थे। अब आयुर्वेद व वनस्पतियों की तो जानकारी नही है या यूं कह लीजिए आधुनिक युग सहूलियतों की वजह से उन से सही से रूबरू भी नही हुआ लेकिन उस बुखार के बाद बढ़ी ह्र्दयगति के आधार पर इतना अंदाजा जरूर लगा सकता हूँ जब मरीज वैध के पास पहुंचता होगा तो वह उसके हांथ की नस से ह्र्दयगति के आधार पर यह जानते होंगे कि बढ़ी हार्टबीट से कितना इंफेक्शन है। और हो सकता यह अनुभव के आधार पर यह भी जान लेते हो कि ह्रदय की किस गति से कौन कौन सा तत्कालीन वायरस सक्रिय हैं और उसे किस वनस्पति की कितनी डोज से किल किया जा सकता है।
कही कही यह भी सुनने में आता है कि हांथ की नाड़ी पकड़कर ज्वर, इंफेक्शन के बारे में वैद्य बता दिया करते थे। और रोग की गम्भीरता भी बता दिया करते हैं। इससे मिलता जुलता तो आप लोगों ने काल्पनिक दुनिया यानी फिल्मी दुनिया मे भी देखा होगा कि गम्भीर रोग घोषित करते हुए वैद्य ने महज नाड़ी देखकर ही निर्णय सुना दिया हो। वह काल्पनिक दुनिया ही सही लेकिन नाड़ी देखकर रोगों की पहचान में महारत हांसिल थे हमारे वैद्यो को।
इस हार्टबीट असमान होने के और भी कई मेडिकली रीजन होंगे इस डॉक्टरों की जुबानी आधिकारिक रूप से सुना भी है कि हीमोग्लोबिन में ऑक्सीजन कम होना, हीमोग्लोबिन कम होना आदि आदि कारण भी होते हैं। लेकिन मैंने यह तजुर्बे के आधार पर आजमाया भी है कि इंफेक्शन आने पर यानी किसी तरह का वायरस आने पर भी हार्टबीट बढ़ जाती है।
वैसे भी भारत भूमि वीरों से कभी खाली नही रही है और हमारे इतिहास, संस्कृति, सभ्यता का इस आधुनिक विज्ञान के विकास में खासा योगदान रहा है।
लेकिन विज्ञान की तरक्की स्वास्थ्य के क्षेत्र में वरदान भी है। अगर इसके सकारात्मक पहलुओं को देखे तो पाएंगे आज व्यक्ति मशीनों पर भी जिंदा रह सकता है। मृत्यु पर तो विज्ञान ने विजय नही प्राप्त की और मृत्यु सास्वत सत्य भी है लेकिन इंसानी मृत्यु को रोकने का प्रयास जरूर किया है। अगर बात करें डायलिसिस की तो विज्ञान मशीनों पर ही काफी काफी दिन गुर्दा प्रभावित व्यक्ति को अभयदान देता दिखता है यह आपके सामने एक बहुत बड़ा उदहारण है जो प्राचीनकाल में इस सुविधा और जानकारी के अभावों में अलग अलग नाम के रोगों से जिंदगी हार जाता था और पता भी नही चलता था। विज्ञान ने इन बीमारियों के नाम दिए और मशीनों के सहारे अंतिम समय तक प्राण फूंकने के रास्ते भी दिए। हालांकि एक नकारात्मक पहलू में विज्ञान अभिशाप भी है उस पर मैं नही जाऊंगा क्योंकि बीते दशक से मैं खुद विज्ञान की दी इस नेमत के सहारे आप लोगो से रूबरू हूं यानी मशीनी मानव, वो इसलिए कि कुदरत प्रदत्त किडनियां जो शरीर का अति महत्वपूर्ण अंग हैं वो तो मृत हो चुकी हैं लेकिन मशीनों के सहारे नियमित उनका काम कराकर, दवाइयों के सहारे रक्त के आवश्यक तत्व बराबर कर आधुनिक युग के भगवानों ( डॉक्टर्स, टेक्नीशियन) ने ठिठकती, छिटकती जिंदगी में प्राण फूंक कर अभ्यदान दे रखा है।

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