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विशेष/ हिन्दू सनातन धर्म का पवित्र पर्व है रक्षाबंधन

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पवित्र बंधन के रूप में पूरे संसार में प्रसिद्ध रेशम की डोर का यह हिन्दू सनातन धर्म का महापर्व श्रावण मास की पूर्णिमा को हर साल पड़ने वाला भाई-बहनों के पवित्र प्यार,नेह स्नेह और अद्वितीय प्रेम का एक प्यारा पर्व रक्षाबंधन है। इसमें हर घर में बहनें अपने प्यारे छोटे बड़े सभी भाइयों के माथे पर रोली चन्दन व अक्षत लगाकर उनका टीका करती हैं,भाई की आरती उतारती हैं और उनके कलाई पर रक्षा सूत्र का यह पवित्र अमर प्रेम का धागा बाँध कर उन्हें मिठाई खिला कर उनके सुखी स्वस्थ जीवन और कुशलता के लिए बहनें ईश्वर से प्रार्थना करती हैं। इसके साथ ही साथ बहनें उन्हें अपना अमूल्य और फलित होने वाला आशीर्वाद भी प्रदान करती हैं। भाई भी उन्हें अपना आशीष प्रदान करता है और उनकी रक्षा करने का वचन देते हुए बहनों को उपहार स्वरूप कुछ न कुछ अवश्य ही प्रदान करता है। भाई-बहनों का यही एक ऐसा महान पर्व है,जिसे राखी,रक्षाबंधन, धागों का त्यौहार,कच्चे धागे का त्यौहार अथवा पवित्र बंधन का त्यौहार कहते हैं।

इस संबंध में वैसे तो अनेकों कथाएं, किंवदंतियां
रक्षाबंधन से जुड़ी हुई हैं और चर्चित प्रचलित भी हैं,किन्तु कुछेक को मैं उदाहरण स्वरूप यहाँ पर जरूर देना चाहूँगा, जिसमें इसके धार्मिक महत्व और पूजन की भी बात सम्मिलित है। वह इस प्रकार है,आप सब इसे भी जानें।

एक बार युधिष्ठिर जी ने भगवान श्रीकृष्ण से कहा हे अच्युत ! मुझे पवित्र बंधन का प्रतीक रक्षाबंधन की वह कथा सुनाइये जिसमें मनुष्यों की प्रेत बाधा और दुःख दूर होता है। भगवान श्रीकृष्ण ने कहा हे पांडव श्रेष्ठ ! एक बार दैत्यों और सुरों में युद्ध छिड़ गया और यह युद्ध लगातार बारह वर्षों तक चलता रहा। असुरों ने देवताओं को पराजित कर उनके प्रतिनिधि इंद्र देव को भी पराजित कर दिया। ऐसी दशा में देवताओं सहित इंद्र अमरावती चले गए। उधर विजेता दैत्यराज ने तीनों लोकों को अपने वश में कर लिया,उसने राजपद से यह भी घोषित कर दिया कि इंद्रदेव सभा में न आयें तथा देवता और मनुष्य यज्ञ कर्म भी न करें। अब सभी लोग मेरी पूजा करें।

दैत्यराज की इस आज्ञा से यज्ञ-वेद, पठन- पाठन, पूजा- संस्कार तथा उत्सव आदि सब समाप्त हो गए। धर्म के नाश से देवताओं का बल घटने लगा। यह देख इंद्रदेव अपने गुरु वृहस्पति देव के पास गए तथा उनके श्रीचरणों में गिर कर निवेदन करने लगे। हे गुरुवर ! ऐसी दशा में परिस्थितियां कहती हैं कि मुझे यहीं अपने प्राण देने होंगें। न तो मैं भाग ही सकता हूँ और ना ही युद्ध भूमि में टिक सकता हूँ। आप कोई उपाय बताइये गुरुवर।

वृहस्पति देव ने इंद्र की वेदना सुन कर उसे रक्षा विधान करने को कहा। श्रावण मास की पूर्णिमा को प्रातः काल निम्न मंत्र द्वारा रक्षा विधान संपन्न किया गया।

येन बद्धो बलि राजा दानवेन्द्रो महाबलः।
तेन त्वाम प्रतिबध्नामि रक्षे माचल माचलः।

इंद्राणी ने श्रावणी पूर्णिमा के पावन अवसर पर द्विजों से स्वस्तिवाचन करवा कर रक्षा का तंतु लिया और इंद्र की दाहिनी कलाई में बांधकर उसे युद्धभूमि में लड़ने को भेज दिया। “रक्षाबंधन” के प्रभाव से सभी दैत्य भाग खड़े हुए और इंद्रदेव की विजय हुई। इस प्रकार पवित्र बंधन की यह राखी
बांधने की प्रथा की शुरुआत यहीं से होती है।

इसके अतिरिक्त भी भारतीय इतिहास में कई मुग़ल बादशाह भी रक्षाबंधन की भावना पर न्योछावर थे। जहांगीर ने एक राजपूत स्त्री का रक्षासूत्र पाकर समाज को विशिष्ट आदर्श प्रदान किया। इस संदर्भ में राजस्थान की पन्नाधाय की राखी विशेषतः उल्लेखनीय है।इस रक्षाबंधन के कच्चे धागे ने दो रियासतों के शासकों को पक्की मैत्री के सूत्र में बांध दिया।

मध्यकालीन इतिहास की घटना में भी चित्तौड़ की हिन्दू रानी कर्मवती ने दिल्ली के मुग़ल बादशाह हुमायूं को अपना भाई मानकर उसके पास राखी भेजी थी। हुमायूं ने रानी कर्मवती की राखी को स्वीकार की और समय आने पर रानी के सम्मान की रक्षा के लिए हुमायूं ने गुजरात के बादशाह से युद्ध भी किया था।

इसी तरह एक बार भगवान श्रीकृष्ण के हाथ में चोट लग गई तथा खून की धार बह निकली। यह देख कर द्रौपदी से नहीं रहा गया और उसने तुरंत अपनी साड़ी का पल्लू फाड़ कर श्रीकृष्ण के हाथ में बांध दिया फलस्वरूप खून का बहना बंद हो गया। कुछ समय पश्चात महाभारत प्रसंग में जब दुष्ट दुःशासन ने द्रौपदी का चीरहरण किया तब श्रीकृष्ण ने चीर बढ़ा कर दौपदी की इज्जत और मर्यादा की रक्षा किया। यह प्रसंग भी हमें राखी,रक्षाबंधन,धागों का त्यौहार और पवित्र बंधन के पवित्र त्यौहार की महत्व और उसकी विशेषता को बतलाता है। इसके अलावा भी इस पर्व और त्यौहार से जुड़े बहुत से किस्से और कहानियां हैं किन्तु सभी प्रसंगों को यहाँ एक छोटे से लेख में समाहित नहीं किया जा सकता है।

आप सभी को इस पवित्र बंधन के महापर्व राखी, रक्षाबंधन की सपरिवार बहुत बहुत हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएं।

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