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लुधियाना/ फोर्टिस के डॉक्टरों ने 14 महीने के शिशु की छोटी आंत से 5 सेंटीमीटर धातु की कील को सफलतापूर्वक किया बाहर

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✍️ सोहन रावत, चंडीगढ़

मोहाली : फोर्टिस लुधियाना में रिपोर्ट किए गए अपने तरह के एक अत्यंत दुर्लभ मामले में, डॉ. नितिन शंकर बहल के नेतृत्व में डॉक्टरों की एक टीम ने बेबी पिंकी (बदला हुआ नाम) को दूसरा जीवन प्रदान करने में सफलता प्राप्त की। सिर्फ 1 साल 2 महीने की उम्र के इस बच्चे ने गलती से 5 सेंटीमीटर की जंग लगी धातु की कील को निगल लिया था, जिसे फोर्टिस डॉक्टर्स ने बेहद सावधानी से बाहर निकाल लिया।

ये घटना 22 अक्टूबर 2021 की सुबह की बताई गई थी। बेबी पिंकी ने अभी-अभी खाना खाया था और वह खेल रही थी जहां उसने गलती से एक जंग लगी धातु की कील को निगल लिया। उसके बाद वह लगातार रोने लगी, लेकिन उसके मां-बाप को समझ नहीं आया कि आखिर उसे हुआ क्या है। काफी कोशिश के बाद भी उनको समझ नहीं आया कि आखिर ऐसा क्या हुआ है कि वह लगातार दर्द से कराह रही है जबकि कुछ समय पहले तक वह काफी शांति से खेली रही थी। उसके बाद उसे तुरंत फोर्टिस लुधियाना ले जाया गया।

मरीज के तौर पर बेबी पिंकी को तुरंत इमरजेंसी डिपार्टमेंट में भर्ती कराया गया। वहां पर भर्ती करने के बाद, डॉ. गौरव मित्तल के नेतृत्व में बाल रोग विशेषज्ञों की टीम द्वारा उनका मूल्यांकन किया गया और हर तरह की जांच की सलाह दी गई। काफी जांच के बाद की सामने आई रिपोर्ट में सामने आया कि बच्ची की छोटी आंत में एक लंबी धातु की कील फंसी हुई थी। उसके तुरंत बाद एक थेराप्यूटिक एंडोस्कोपी की योजना बनाई गई थी जहां एंडोस्कोपी सर्जरी के माध्यम से बच्चे को राहत प्रदान करने का निर्णय लिया गया था। कील हटाने के लिए इनोवेटिव एंडोस्कोपिक तकनीक का इस्तेमाल डॉ. नितिन बहल और एनेस्थीसिया टीम द्वारा किया गया था जिन्होंने बच्चे को बेहोश किया ताकि पूरा प्रोसेस सफलतापूर्वक पूरा किया जा सके।

डॉ.नितिन शंकर, एडीशनल डायरेक्टर, गैस्ट्रोएंट्रोलॉजी, फोर्टिस हॉस्पिटल, लुधियाना ने कहा कि ‘‘बच्ची ने एक कील को गलती से अपने मुंह के माध्यम से निगल लिया गया था, जिसके चलते बच्ची के बाहरी अंगों को ज्यादा नुकसान नहीं हुआ था, हालांकि यह म्यूकोसल चोटों के कारण आंतरिक अंगों को घायल कर देता था और जांच के दौरान देखा गया था डिस्टल डुओडेनम (छोटी आंत) में पड़ा हुआ था। यह तकनीकी रूप से चुनौतीपूर्ण था क्योंकि यह छोटी आंत में चला गया था और इसका एक सिरा काफी नुकीला था और इसका सिरा भी दांतîार था जो कि बच्ची के आंतरिक अंगों को नुकसान पहुंचाता है। इस प्रकार के मामलों में इस बात का खास ख्याल रखना होता है कि इस तरह की चीज को न्यूनतम तौर पर बेहोश कर (एनस्थीसिया देकर)सुरक्षित तौर पर शरीर से बाहर निकालना होता है ताकि उसके आंतरिक अंगों को कोई नुक्सान नहीं पहुंचे।’’

उन्होंने बताया कि ‘‘सर्जरी के दौरान आंतरिक अंगों को किसी भी तरह की चोट से बचाने के लिए एक सुरक्षात्मक ट्यूब के साथ एक स्पेशल पीडियाट्रिक एंडोस्कोप का उपयोग किया गया था। इसे न्यूनतम म्यूकोसल चोट के साथ सुरक्षित रूप से हटा दिया गया था और पूरे प्रोसेस के बाद कोई जटिलता नहीं देखी गई थी। बच्ची सर्जरी के बाद अच्छी रिकवरी कर रही है और बेबी पिंक सर्जरी के तुरंत बाद अपने मुंह से पीने के लिए कुछ ना कुछ तरल को लेने में पूरी तरह से सक्षम थी।’’

फोर्टिस हॉस्पिटल लुधियाना के जोनल डायरेक्टर डॉ. विश्वदीप गोयल ने इस सफलता के लिए डॉक्टरों की टीम को बधाई दी। डॉ. गोयल ने कहा कि ‘‘मुंह के माध्यम से निगले गए इस तरह की किसी भी चीज से शरीर के श्वसन और गैस्ट्रोइंस्ट्रायल सिस्टम्स में प्रवेश करके गंभीर तौर पर समस्या पैदा होने और कई बार मृत्यु दर का कारण बनते हैं। इसलिए, इन मामलों का तत्काल मूल्यांकन करने की आवश्यकता है। इस मामले में निगला गया कील नुकीला, जंग लगा हुआ और आकार और आयतन में बड़ा था। जिस बात ने मामले को जटिल बनाया वह थी मरीज की उम्र। डॉ. बहल के नेतृत्व में डॉक्टरों की टीम ने उपचार की सही पद्धति को अपनाया और इस प्रकार बच्चे को दूसरा जीवन दिया और परिवार को आशा दी, जिसने बच्चे के जीवित रहने की संभावना को छोड़ दिया था।’’

हालांकि, रोगियों में धातु की वस्तुओं को सफलतापूर्वक हटाने से संबंधित मामले पहले भी सामने आए हैं, इसके बावजूद सिर्फ 14 महीने के शिशु की छोटी आंत में से सिर्फ 5 सेमी धातु की कील को सफलतापूर्वक निकालना अपनी तरह का एक पहला मामला है। इस मामले में हासिल सफलता इस बात का प्रमाण है कि फोर्टिस लुधियाना की गैस्ट्रोएंटरोलॉजी टीम और उसकी क्लीनिकल विशेषज्ञता बेमिसाल है। इसके साथ ही फोर्टिस हॉस्पिटल, लुधियाना में मेडिकल इंफ्रास्ट्रक्चर भी विश्वस्तरीय है।

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