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धर्म/ सूर्योपासना व छठ पूजा, सनातन धर्म का विशेष पर्व

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✍️ डॉ. विनय कुमार श्रीवास्तव,
वरिष्ठ प्रवक्ता- पी बी कालेज, प्रतापगढ़ सिट (उ.प्र.)

प्रत्येक मनुष्य के लिए स्वस्थ्य जीवन और उसके कामनाओं की पूर्ति के लिए जीवन में सूर्य देव की उपासना और उन्हें नित्य प्रातः काल में अर्घ्य देने का सदियों से सनातन हिन्दू धर्म और संस्कृति में बहुत बड़ा महत्त्व रहा है।

प्राचीन धार्मिक मान्यताओं के अनुसार छठ देवी भगवान सूर्य देव की बहन हैं और उन्हीं को प्रसन्न करने के लिए सम्पूर्ण विश्व एवं पृथ्वी लोक को अपनी ऊर्जा व रौशनी से आलोकित करने वाले भगवान सूर्यदेव की पूजा आराधना सदियों से की जाती रही है।

मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम और माता सीता जी ने भी रावण वध के बाद इसी कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की षष्ठी को व्रत उपवास रखा था और सूर्यदेव भगवान की पूजा आराधना किया था तथा अगले दिन अर्थात सप्तमी को उगते हुए सूर्य की पूजा की और आशीर्वाद प्राप्त किया।

इस सम्बंध में एक अन्य मान्यता के अनुसार छठ पूजा की शुरुआत महाभारत काल में ही हुई। छठ पूजा के सम्बंध में महाभारत में कुन्ती द्वारा सूर्य उपासना करने का भी उल्लेख मिलता है,जो कि अपने सभी परिजनों के स्वास्थ्य और लम्बी उम्र की कामना पूर्ति के लिए नियमित रूप से वह सूर्य की पूजा उपासना करती थीं।

कहते हैं कुन्ती की इस नियमित पूजा से ही प्रसन्न हो कर भगवान सूर्यदेव ने कुन्ती को विवाह से पूर्व ही कर्ण के रूप में पुत्र प्रदान किया था। सूर्यपुत्र कर्ण भी यह पूजा यानी सूर्य की उपासना आराधना करते थे।वे अंग प्रदेश यानी वर्तमान बिहार के भागलपुर के राजा थे। कर्ण घंटो तक कमर भर पानी में खड़े रह कर नित्य अपने पिता सूर्यदेव को अर्घ्य देते थे और उनकी पूजा करते थे। सूर्यदेव की नियमित पूजा और उन्हें अर्घ्य देने से ही उनकी कृपा से ही कर्ण परम योद्धा बने थे।

इसी अर्घ्य को लेकर आज भी छठ पूजा में सूर्य भगवान को अर्घ्य देने की पुरातन सनातन परम्परा चली आ रही है। लोक कल्याण और अभीष्ठ फल प्राप्ति के लिए भगवान सूर्य के उपासना एवं उन्हें अर्घ्य देने की यह परम्परा न केवल विशेषकर बिहार क्षेत्र के वासियों में चली आरही है बल्कि देश विदेश में बसे हमारे बिहारी प्रवासियों में आज भी वर्षों से चलती चली आ रही है। वे इस पर्व को हर्षोल्लास के साथ मनाते चले आ रहे हैं। सूर्य देव की पूजा और उनको नित्य जल अर्पित करने अर्थात अर्ध्य देने की परंपरा तो हिन्दू धर्म में प्राचीन काल से ही रही है किन्तु यह बिहारियों के लिए एक बहुत बड़ा पावन पर्व है।

सतयुग काल में भी जहाँ इस सूर्य पूजा और छठ पूजन का वर्णन मिलता है वहीँ त्रेतायुग में भी मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम और माता सीता द्वारा भगवान सूर्यदेव का व्रत रख कर उनका विधि विधान से पूजन किया था। इसी दिन माता गायत्री का जन्म और गायत्री मंत्र का विस्तार भी माना जाता है। माता कुन्ती द्वारा सूर्य उपासना और महाराजा कर्ण द्वारा सूर्य पूजन एवं अर्ध्य देने को महाभारत काल के दौरान भी इतिहास में यह देखा जा सकता है। द्रौपती द्वारा भी वनवास में रहते हुए अपने खोए हुए राजपाट की पुनः प्राप्ति व पुत्र कामना के लिए सूर्योपासना का विधिवत वर्णन मिलता है।

माता दुर्गा,राधा,लक्ष्मी,सरस्वती और सावित्री ये पांच देवियां सम्पूर्ण प्रकृति कहलाती हैं। इन्ही के प्रधान अंश को माता देवसेना कहते हैं। प्रकृति की देवी का छठवां अंश होने के नाते ही माता देवसेना को षष्ठी माता के नाम से जाना जाता है। ये माँ ही संसार के सभी संतानों की जननी और रक्षक हैं।

संतान कामना और दीर्घायु के लिए महापर्व छठ पर विशेष स्वच्छता एवं अपार निष्ठा का विशेष महत्त्व है। इसमें शुद्धता का विशेष ख्याल रखा जाता है। इस व्रत के अनुष्ठान में सामान की खरीदारी में बांस बड़ी डलिया ,सूप ,केला,गन्ना और अन्य फलों की महत्ता को देखते हुए सभी श्रद्धालुओं द्वारा इसे भारी संख्या में विभिन्न फल अधिकाधिक मात्रा में लेते हैं और इन फलों का प्रयोग छठ माता की पूजा में करते हैं। पूजा के ये सभी सामान खरीदने के बाद उसे ऐसे स्थान पर रखते हैं,जहाँ उसकी पवित्रता बनी रहे। भगवान सूर्यदेव की उपासना के लिए सनातन धर्मियों को आदि शंकराचार्य जी ने भी प्रेरित किया था। यह सूर्योपासना का पर्व तो सदियों से चला आ रहा है। शाक्य द्विपीय ब्राह्मणों को सूर्य पूजा का विशेषज्ञ होने के कारण राजाओं महाराजाओं द्वारा सदैव इन्हें आमंत्रित किया जाता रहा है। ऋग्वेद में भी सूर्य पूजा का विशेष महात्म्य मिलता है।

इस प्रकार हम सभी भारत वासियों के लिये यह छठ पूजा पर्व अत्यंत महत्वपूर्ण और उत्सव पूर्वक मनाने वाला महापर्व हैं। इस अवसर पर भोजपुरी स्वर कोकिला श्रीमती शारदा सिन्हा जी द्वारा भी छट्ठी माता के लिए गाया गया हर गीत बहुत ही मनभावन और सुनने में कर्णप्रिय होता है। विभिन्न हिन्दी एवं भोजपुरी फिल्मों में भी छठ पूजा पर्व बहुत सुंदर ढंग से दरसाई गई है। बिहार में बनी एक फ़िल्म “विधना नाच नचावै” फिल्म में भी छठ पूजा का दृश्य और गीत का बहुत ही सुंदर ढंग से उसके निर्माता निर्देशक एवं कलाकार श्री प्रभात वर्मा जी द्वारा फिल्माया गया है,जो छठ पूजा के विशेष महत्व एवं सुखद चित्रण, वातावरण व छठ पर्व के महत्त्व को दर्शाता है।

वास्तव में यह सूर्योपासना और छठ माता की पूजा का विशेष पर्व हम सभी सनातन हिन्दू संस्कृति और सनातन धर्मियों के लिए बहुत बड़े महत्त्व का एक पावन महापर्व है।

🙏जय छट्ठी मइया🙏

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